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एक युग का अंत चले गए जयदेव ਬਾਤਿਸ਼ जी

📅 21 Aug 2026 12:13 PM | 👁 55 Views

एक युग का अंत
श्री जयदेव बातिश जी के परलोक गमन से विद्या भारती पंजाब में एक युग का अंत हो गया। आप अपने जीवन की 9 दशक की सफल यात्रा पूरी कर इस समय 94 वर्ष पूरे करने वाले थे। हम सब लोग उनसे सौ वर्ष पर बड़ा कार्यक्रम करने की बात करते रहते थे। वे हंस पड़ते थे। इतनी आयु में भी स्वस्थ होने का रहस्य पूछने पर वे इसे ईश्वर कृपा तथा संगठन कार्य में सक्रियता को बताते थे। मैंने पिछले दस वर्षों में एक आध अपवाद छोड़ कर शायद ही कभी उन्हें अस्वस्थ सुना या देखा हो। श्री जयदेव बातिश जी पंजाब विद्या भारती के आधार स्तंभ थे। सरकारी सेवा से मुक्ति के पश्चात आप 1990 के दशक में विद्या भारती पंजाब के कार्य से जुड़े। उसके बाद आपने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। आपने पंजाब एवं उत्तर क्षेत्र में अनेक दायित्वों पर कार्य किया। संगठन की विशेष परिस्थिति में आप प्रांत के कार्यकारी अध्यक्ष भी रहे। जो कार्य संगठन ने दिया आपने विनम्रतापूर्वक उसका निर्वहन किया। आपने उत्तर क्षेत्र में ऑडिट कार्य का कई वर्षों तक सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। ऑडिट की उनकी जानकारी बेजोड़ थी। संगठन में आर्थिक ईमानदारी को लेकर वे बहुत ही संजीदा रहते थे। बहुत लोग उनसे इस विषय पर असहज भी हो जाते थे। लेकिन वे कभी समझौता नहीं करते थे। उनकी ऑडिट रिपोर्ट पर प्रांत या क्षेत्र तुरंत कार्यवाही नहीं करता, इस विषय पर वे अपना असंतोष भी प्रकट कर देते थे।
श्री बातिश जी कार्य करने का जोश, उत्साह तथा जज्बा आज भी बिल्कुल युवा की तरह बना हुआ था। मैं तो मजाक में कहता था असली युवा तो बातिश जी हैं। हम तो कई बार थक भी जाते हैं लेकिन बातिश जी में थकान दूर दूर तक दिखाई नहीं देती थी। खाने पीने को ले कर भी कोई परहेज नहीं था। कुछ वर्ष से उन्होंने मीठा लेना कम कर दिया था अन्यथा मीठा के प्रति उनका आकर्षण सर्वविदित था। प्रांत संगठन मंत्री का दायित्व आने के बाद से मेरा उनके साथ कार्य करने का पिछले एक दशक का अनुभव शानदार रहा। बहुत स्नेह मिलता था। बहुत बार वे अकेले बैठा कर अपने मन की वेदना साझा कर लेते थे। अभी भीखी में क्षेत्र की खेलों में पूरा समय रहे। संगठन के कार्य के प्रति उनकी चिंता सदैव प्रकट होती रहती थी। इस बार भी वे मुझे अकेले लेकर बैठ गए। बोले, ' संगठन की स्थिति ठीक होनी चाहिए। कार्यकर्ता नाराज नहीं होने चाहिए। आप कुछ समय लगाया करो।' मैंने मजाक में टाल दिया कि आप संरक्षक हैं। आप मोर्चा सम्भालो। आपका कहना कौन मोड़ेगा।' क्या मालूम था कि इस बार यह उनका आग्रह अंतिम होगा। श्री बातिश जी अखबार अंग्रेजी का ही पढ़ते थे। मैंने मजाक किया कि बातिश जी आप हमेशा अंग्रेजी अखबार ही पढ़ते हो। आप बच्चों एवं आचार्यों से अंग्रेजी बोला करो। वे कुछ नहीं बोले। बस मुस्करा दिए। भीखी में आयोजित खेल कूद कार्यक्रम में उन्होंने खेल कार्यक्रमों में पूरे उत्साह से भाग लिया। कई बार उन्हें विश्राम के लिए आग्रह कर के भेजते थे। कुछ दिन पूर्व उनके हॉस्पिटल में एडमिट होने का समाचार श्री सुरेन्द्र अत्री जी के द्वारा प्राप्त हुआ। मैंने उनसे हॉस्पिटल मिलने छूने के का आग्रह किया। श्री अत्री जी ने कहा कि हॉस्पिटल वाले मिलने नहीं देते। इसलिए जाने का ज्यादा लाभ नहीं होगा। फिर हम हॉस्पिटल में कोई परिचय ढूंढने में लग गए कि उन्हें सही इलाज मिल सके। अभी हमारे ये प्रयास चल ही रहे थे कि कल के समाचार ने सब प्रयासों पर विराम लगा दिया। मन बेचैन है, उनके जाने से ऐसी रिक्तता निर्माण हो गई जिसे अब भरना असंभव है। विद्या भारती उत्तर क्षेत्र की ओर से उस दिव्य आत्मा को प्रणाम।

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